इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया है कि कोई भी अजनबी आपराधिक मामले में आरोपी की जमानत रद्द करने की मांग नहीं कर सकता. कोर्ट ने थर्ड पार्टी द्वारा दायर ऐसी याचिका खारिज करते हुए 25,000 रुपए का जुर्माना लगाया. कोर्ट ने कहा कि पीड़ित या सूचनाकर्ता के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को इस तरह की कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस कृष्ण पहल की बेंच ने एक थर्ड पार्टी की जमानत याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति क्रिमिनल कार्रवाई से “अलग” है, न तो उस खास मामले में इन्फॉर्मर है और न ही विक्टिम, उसे ऐसी राहत मांगने का कोई हक नहीं है. कोर्ट ने पर्सनल बदले की भावना से “बेकार” याचिका फाइल करने के लिए आवेदक पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया.

कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि क्या कोई व्यक्ति जो किसी खास क्रिमिनल केस में न तो विक्टिम है, न इन्फॉर्मर, और न ही गवाह, उसके पास उस मामले में आरोपी को दी गई बेल कैंसल करने की एप्लीकेशन फाइल करने का हक (लीगल स्टैंडिंग) है.

 

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