Tere Ishk Mein Review In Hindi: ‘तेरे इश्क में’ थिएटर में रिलीज हो चुकी है. इस फिल्म का निर्देशन ‘रांझणा’ फेम आनंद एल राय ने किया है. इस फिल्म में धनुष और कृति सेनन प्रमुख भूमिका में नजर आ रहे हैं. क्या आप ये फिल्म थिएटर में जाकर देखना चाहते हैं? तो टिकट बुक करने से पहले ये रिव्यू जरूर पढ़ें.

Tere Ishk Mein Review In Hindi: फिल्म ‘तेरे इश्क में’ के साथ निर्देशक आनंद एल राय ने एक बार फिर मोहब्बत के मुश्किल रास्तों पर कदम रखा है. ‘रांझणा’ जैसी क्लासिक देने के बाद, उनकी पिछली तीन फिल्में— ‘जीरो’, ‘अतरंगी रे’ और ‘रक्षा बंधन’ बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई थीं. जाहिर है, इस बार राय साहब ने बहुत संभलकर शतरंज की बिसात बिछाई है.

Tere Ishk Mein की बात करें तो फिल्म एक आम प्रेम कहानी नहीं है. ये जुनून, बदला, और इमोशनल उथल-पुथल की एक तेज रफ्तार से चलने वाली दिलचस्प प्रेम कहानी है. आनंद एल राय ने इस बार कहानी में मसाला के साथ-साथ इमोशन और ड्रामा का दमदार तड़का लगाया है. लेकिन क्या धनुष के इस ‘जुनून’ और कृति के ‘अजीब एक्सपेरिमेंट वाले प्यार’ ने मिलकर पर्दे पर ‘रांझणा’ वाली आग लगाई है? या फिर ये कॉम्प्लिकेटेड लव स्टोरी हमें बीच भंवर में छोड़कर चली जाती है? जानने के लिए, पूरा रिव्यू जरूर पढ़ें.

कहानी

‘तेरे इश्क में’ की कहानी शंकर (धनुष) और मुक्ति (कृति सेनन) के इर्द-गिर्द घूमती है. मुक्ति एक पढ़ी-लिखी लड़की है, उसके पिता आईएएस अधिकारी है. वो कॉलेज में एक रिसर्च स्कॉलर हैं, वो जिस थीसिस पर काम कर रही है, उसका विषय है, कैसे एक अग्रेसिव यानी हिंसक इंसान के अंदर से हिंसा को स्थायी रूप से बाहर निकाला जा सकता है. इस थीसिस के लिए उसे एक ‘टेस्ट केस’ की तलाश रहती है और तब उसे मिलता है शंकर. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष शंकर देखा जाए तो एक बेरोजगार गुंडागर्दी करने वाला गुस्सैल इंसान है. मुक्ति उसे अपना टेस्ट केस बनाती है. लेकिन, शंकर मुक्ति से इश्क कर बैठता है. अब ये इश्क दोनों की जिंदगी में क्या तूफान लेकर आता है, ये जानने के लिए आपको ये पूरी फिल्म थिएटर में जाकर देखनी होगी.

जानें कैसी है फिल्म?

फिल्म की शुरुआत शानदार है. शंकर और मुक्ति की केमिस्ट्री एकदम ताजी-ताजी मोहब्बत जैसी लगती है. वो हल्के-फुल्के पल, वो नॉस्टैल्जिया वाला फील… लगता है जैसे आप खुद ही उनके साथ चाय की चुस्की ले रहे हों. वो ट्रेलर वाला सीन याद है, जब शंकर ने मुक्ति के हाथ से खुद को धमाकेदार थप्पड़ मारा था? हां! वो वाला सीन फिल्म के पावरफुल मोमेंट्स में से एक है, जो आपको कुर्सी से बांधे रखता है. लेकिन, कहानी आगे बढ़ती है, तो मामला भी बदल जाता है. प्रेम कहानी की जगह जुनून की आग दिखती है. शंकर जब खुद को बर्बाद करने पर उतरता है, तब आनंद एल राय साहब स्क्रीन पर विस्फोट कर देते हैं. प्यार, धोखा, और बदला—ये सब मिलकर एक ऐसा दर्दनाक चक्रव्यूह बनाते हैं, लेकिन इस चक्रव्यूह में दर्शक कई बार गूम भी हो जाता है. एक तरफा प्यार की कॉन्सेप्ट को छोड़कर इस फिल्म में ‘रांझणा’ जैसा कुछ भी नहीं है. लेखक हिमांशु शर्मा और नीरज यादव ने आनंद एल राय के साथ मिलकर एक अच्छी फिल्म हमारे सामने पेश की है.

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