बंदरों का आतंक राष्ट्रीय समस्या, निपटने के लिए बने व्यापक कार्ययोजना-अनुराग सिंह ठाकुर

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मोदी सरकार में विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं का हब बना भारत: अनुराग सिंह ठाकुर
मोदी सरकार में विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं का हब बना भारत: अनुराग सिंह ठाकुर

आदर्श हिमाचल ब्यूरों

नई दिल्ली / हिमाचल प्रदेश |पूर्व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री एवं हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद अनुराग ठाकुर  ने लोकसभा में नियम 377 के अंतर्गत बंदरों के बढ़ते आतंक का मुद्दा उठाते हुए इसे राष्ट्रीय संकट बताया और केंद्र सरकार से इस पर तत्काल व्यापक एवं समन्वित राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाने की मांग की।

 

उन्होंने सदन का ध्यान देशभर, विशेषकर कृषि प्रधान राज्यों में बंदरों की अनियंत्रित बढ़ती आबादी से हो रही भारी क्षति की ओर आकर्षित किया। हिमाचल प्रदेश का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पिछले सात वर्षों में राज्य में बंदरों के कारण कृषि को लगभग 2,200 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसके अलावा, 70,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि योग्य भूमि पर किसानों को खेती छोड़नी पड़ी है, जबकि वार्षिक फसल नुकसान 500 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया है।

 

मानव जीवन पर इसके प्रभाव का उल्लेख करते हुए अनुराग ठाकुर ने कहा कि बंदरों के हमले लगातार बढ़ रहे हैं। जिला-स्तरीय आंकड़ों के अनुसार, कई क्षेत्रों में प्रतिदिन औसतन 10 लोगों के बंदरों द्वारा काटे जाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर इसका सबसे अधिक असर पड़ रहा है, जिससे प्रभावित क्षेत्रों में भय और तनाव का माहौल बना हुआ है।

 

समस्या के मूल कारणों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने 1978 में बंदरों के निर्यात पर लगे प्रतिबंध, वनों की कटाई, प्राकृतिक आवासों के विनाश तथा शिकारी प्रजातियों की कमी को प्रमुख कारण बताया। साथ ही, राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित नीति के अभाव को भी इस समस्या के बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया।

 

उन्होंने कहा, “आज बंदरों का आतंक एक राष्ट्रीय संकट बन चुका है। किसान अपनी जमीन छोड़ने को मजबूर हैं और आम नागरिक रोजाना हमलों का सामना कर रहे हैं। राज्य सरकारें अकेले इस चुनौती का सामना नहीं कर सकतीं। केंद्र सरकार को एक वैज्ञानिक, मानवीय और प्रभावी राष्ट्रीय कार्ययोजना के साथ आगे आना होगा।”
अनुराग ठाकुर ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि बंदर-मानव संघर्ष से निपटने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाई जाए, जिसमें प्रभावित राज्यों से परामर्श किया जाए। उन्होंने बड़े स्तर पर नसबंदी कार्यक्रमों और इम्यूनोकॉन्ट्रासेप्शन जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाने, साथ ही प्राकृतिक आवास बहाली पर भी जोर दिया।

 

इसके अतिरिक्त, उन्होंने किसानों के लिए समयबद्ध और मानकीकृत मुआवजा प्रणाली लागू करने, तथा जमीनी स्तर पर समुदाय आधारित फसल सुरक्षा उपायों को सशक्त बनाने की मांग की। उन्होंने इस दिशा में समर्पित बजट आवंटन और राज्यों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने पर भी बल दिया।

 

अंत में उन्होंने कहा कि यह केवल किसी एक राज्य का प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का गंभीर मुद्दा है, जिसके समाधान के लिए ठोस और समन्वित कदम उठाना अत्यंत आवश्यक है।