आदर्श हिमाचल ब्यूरो
सावडा/शिमला ।डीएवी सरस्वती नगर, सावरा, जुब्बल में विद्यार्थियों की अंतर्निहित प्रतिभा, अभिरुचि, क्षमता और भविष्य की संभावनाओं को समझने के उद्देश्य से 3 से 6 अक्टूबर 2026 तक “व्यक्तिगत रूपांतरण एवं मानवीय क्षमता : डिजिटल तकनीकों एवं मनोमितीय परीक्षण के माध्यम से अंतर्निहित प्रतिभा की पहचान” विषय पर विशेष व्याख्यान-सह-कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का आयोजन विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री अरुण शर्मा की अध्यक्षता में किया गया। इसमें कक्षा दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं के विज्ञान, वाणिज्य तथा कला संकाय के विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी की। कार्यक्रम का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को यह समझने में सहायता प्रदान करना था कि महत्वपूर्ण शैक्षणिक एवं व्यवसायिक निर्णय लेने से पहले उनकी अभिरुचि, योग्यता, व्यक्तित्व, सीखने की शैली, रुचियों और अंतर्निहित क्षमताओं को समझना क्यों आवश्यक है।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर (डॉ.) बी. एस. चौहान, अतिथि आचार्य, आईजीएमसी शिमला, तथा डॉ. नितिका वर्मा, मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण प्रशिक्षक तथा विद्यार्थी परामर्शदाता, ने विद्यार्थियों के साथ संवाद किया।
विद्यार्थियों को केवल अंक नहीं, अपनी क्षमता समझने की आवश्यकता : अरुण शर्मा
विद्यालय के प्रधानाचार्य अरुण शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में विद्यार्थी अत्यधिक शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा, प्रवेश परीक्षाओं, अभिभावकीय अपेक्षाओं, साथियों की प्रतिस्पर्धा तथा तेजी से बदलते व्यवसायिक अवसरों के बीच शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे वातावरण में कक्षा दसवीं और बारहवीं के आसपास विषय एवं भविष्य के व्यवसाय का चयन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण निर्णय बन जाता है।
उन्होंने कहा कि व्यवसायिक परामर्श केवल यह बताने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि कौन-कौन से व्यवसाय उपलब्ध हैं। इससे पहले विद्यार्थियों को स्वयं को समझने का अवसर मिलना चाहिए।
प्रधानाचार्य ने कहा कि विद्यार्थियों की रुचि, योग्यता, व्यक्तित्व, सीखने की शैली, क्षमता, रचनात्मकता और विकास के क्षेत्रों को समझकर ही उन्हें उचित दिशा प्रदान की जा सकती है।
उन्होंने इस प्रकार के कार्यक्रमों को विद्यालयी शिक्षा का नियमित एवं महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
चिकित्सा, गैर-चिकित्सा, कला और वाणिज्य को लेकर विद्यार्थियों ने व्यक्त किए विचार
कक्षा दसवीं के विद्यार्थियों के लिए यह कार्यक्रम विशेष रूप से उपयोगी रहा, क्योंकि वे शीघ्र ही अपने आगामी विषय-संयोजन और शैक्षणिक दिशा का चयन करने वाले हैं।
संवाद के दौरान अनेक विद्यार्थियों ने चिकित्सा क्षेत्र में जाने की इच्छा व्यक्त की, जबकि कई विद्यार्थियों ने गैर-चिकित्सा विज्ञान को अपने भविष्य के लिए उपयुक्त बताया। कुछ विद्यार्थियों ने कला तथा वाणिज्य विषयों को चुनने में भी रुचि दिखाई।
विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों को समझाया कि किसी भी विषय-संकाय को दूसरे से श्रेष्ठ या निम्न मानना उचित नहीं है। विषय का चयन विद्यार्थी की रुचि, योग्यता, शैक्षणिक तैयारी, व्यक्तित्व, प्रेरणा और भविष्य के लक्ष्य के अनुरूप होना चाहिए।
कक्षा ग्यारहवीं और बारहवीं के विद्यार्थियों, विशेष रूप से चिकित्सा एवं गैर-चिकित्सा वर्ग के विद्यार्थियों ने भी विशेषज्ञों के साथ उत्साहपूर्वक संवाद किया।
व्यवसायिक परामर्श से प्रतिभा-आधारित परामर्श की ओर बढ़ने की आवश्यकता
प्रोफेसर (डॉ.) बी. एस. चौहान ने कहा कि वर्तमान समय में विद्यालयों को पारंपरिक व्यवसायिक परामर्श से आगे बढ़कर प्रतिभा-आधारित, वैज्ञानिक एवं प्रमाण-आधारित परामर्श व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि सामान्यतः व्यवसायिक परामर्श का पहला प्रश्न होता है—“आप कौन-सा व्यवसाय चुनना चाहते हैं?” लेकिन इससे पहले यह समझना आवश्यक है कि “आप किस प्रकार के विद्यार्थी हैं, आपकी प्रमुख क्षमताएं और रुचियां क्या हैं तथा इन्हें किस दिशा में विकसित किया जा सकता है?”
उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक अनुभवों का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने ब्रिटेन, जापान, थाईलैंड और संयुक्त अरब अमीरात सहित विभिन्न देशों की शैक्षणिक व्यवस्थाओं एवं संस्थानों का अध्ययन तथा भ्रमण किया है। उन्होंने शिक्षा में मनोविज्ञान, तकनीक, नवाचार और मानवीय क्षमता विकास के बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने सुझाव दिया कि विद्यालयों में प्रतिभा पहचान, मनोमितीय परीक्षण, व्यक्तिगत परामर्श, मार्गदर्शन, परामर्शोत्तर अनुश्रवण और व्यवसायिक नियोजन को एक व्यवस्थित प्रक्रिया के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
वैश्विक शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में भारत के सामने बड़ी चुनौती
कार्यशाला में भारत की शिक्षा व्यवस्था और वैश्विक शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा पर भी गंभीर चर्चा हुई।
विशेषज्ञों ने बताया कि विभिन्न अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय रैंकिंग में भारत के शीर्ष संस्थान अभी भी विश्व के सर्वोच्च स्तर पर पर्याप्त संख्या में स्थान नहीं बना पाए हैं। क्यूएस विश्व विश्वविद्यालय रैंकिंग 2027 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली 118वें और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई 134वें स्थान पर हैं।
हालांकि इन रैंकिंग को किसी देश की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था का अंतिम मापदंड नहीं माना जा सकता, लेकिन ये आंकड़े भारत के सामने वैश्विक शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में मौजूद चुनौती को अवश्य रेखांकित करते हैं।
वहीं दूसरी ओर, भारत ने नवाचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। वैश्विक नवाचार सूचकांक 2025 में भारत को 38वां स्थान प्राप्त हुआ है। इस प्रकार भारत की स्थिति को केवल चुनौतियों के संदर्भ में नहीं, बल्कि तेजी से हो रही प्रगति के संदर्भ में भी देखना आवश्यक है।
कार्यशाला में यह विचार सामने आया कि भारत को अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित करना होगा।
नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों का उल्लेख करते हुए वक्ताओं ने कहा कि भारत कभी विश्व के प्रमुख ज्ञान केंद्रों में शामिल था, जहां दुनिया के विभिन्न हिस्सों से विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते थे। आज आवश्यकता है कि भारत पुनः ऐसा शैक्षणिक वातावरण विकसित करे, जहां ज्ञान, अनुसंधान, नवाचार, रचनात्मकता और मानवीय विकास एक साथ आगे बढ़ें।
डिजिटल तकनीकों का व्यावहारिक प्रदर्शन बना आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम का महत्वपूर्ण पक्ष डिजिटल तकनीकों एवं मूल्यांकन उपकरणों का व्यावहारिक प्रदर्शन रहा।
इस दौरान विद्यार्थियों और शिक्षकों को निम्नलिखित विषयों एवं तकनीकों से परिचित कराया गया—
– डर्मेटोग्लिफिक्स बहु-बौद्धिकता परीक्षण
– ब्रेन जिम गतिविधियां
– ओमरोन कराडा स्कैन
– डीएनए प्रोफाइलिंग की संभावनाओं का परिचय
– मनोमितीय परीक्षणों के माध्यम से विद्यार्थी की विभिन्न विशेषताओं को समझने के तरीके
– तकनीक आधारित वैज्ञानिक विद्यार्थी परामर्श
विद्यार्थियों तथा शिक्षकों ने इन गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लिया।
प्रदर्शन में अनन्या जिंटा, आर्य देव, श्रिया, नमन चौहान, नन्या झालटा और अडू रिका झांटा सहित विद्यार्थियों ने भाग लिया। शिक्षकों में आरती शर्मा, अंशुमन नेगी, स्वाति शाक्तान, विनय कुमार, सुषमा घेजटा, पूजा ओक्टा और राहुल जिंटा ने सक्रिय सहभागिता की। विद्यालय के प्रधानाचार्य अरुण शर्मा तथा उपप्रधानाचार्य सुशील कुमार ने भी गतिविधियों में भाग लिया।
विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि किसी भी डिजिटल तकनीक या परीक्षण को विद्यार्थी के भविष्य का अंतिम निर्धारक नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे उपकरणों का उपयोग मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, शिक्षक के अवलोकन, शैक्षणिक प्रदर्शन, विद्यार्थी की रुचियों तथा विशेषज्ञ परामर्श के साथ समग्र रूप से किया जाना चाहिए।
शिक्षकों और विद्यार्थियों ने की कार्यक्रम की सराहना
विद्यालय के वरिष्ठ शिक्षकों ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम विद्यार्थियों को केवल परीक्षा और अंकों की दृष्टि से देखने के बजाय उनके समग्र व्यक्तित्व और संभावनाओं को समझने में सहायता करते हैं।
उपप्रधानाचार्य एवं वरिष्ठ अंग्रेजी शिक्षक श्री सुशील कुमार ने कहा कि विद्यार्थियों को अंकों से आगे बढ़कर अपनी वास्तविक क्षमताओं, रुचियों और व्यक्तित्व को समझने के अवसर मिलने चाहिए।
श्री विनय कुमार सहित अन्य शिक्षकों ने भी आधुनिक तकनीक, मनोविज्ञान और विद्यार्थी परामर्श को विद्यालयी शिक्षा से जोड़ने की पहल की सराहना की।
विद्यार्थियों ने भी कहा कि कार्यशाला ने उन्हें विषय चयन और भविष्य के व्यवसाय को लेकर एक नया दृष्टिकोण दिया तथा अपनी रुचियों एवं क्षमताओं के बारे में सोचने का अवसर प्रदान किया।
कार्यशाला से उभरे दस प्रमुख मार्गदर्शक सूत्र
कार्यशाला के दौरान विद्यालयों और अभिभावकों के लिए निम्नलिखित प्रमुख सुझाव सामने आए—
1. व्यवसाय सुझाने से पहले विद्यार्थी को समझें।
2. कक्षा दसवीं से पहले व्यवस्थित परामर्श की व्यवस्था विकसित करें।
3. मनोमितीय परीक्षण को विशेषज्ञ मानवीय परामर्श के साथ जोड़ें।
4. डिजिटल तकनीकों का जिम्मेदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उपयोग करें।
5. विज्ञान, वाणिज्य और कला—सभी शैक्षणिक मार्गों को समान सम्मान दें।
6. मानसिक स्वास्थ्य एवं कल्याण को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाएं।
7. विद्यालय स्तर पर प्रतिभा पहचान एवं मार्गदर्शन व्यवस्था विकसित करें।
8. अभिभावकों को विद्यार्थी के भविष्य निर्माण में सहभागी बनाएं।
9. सफलता को केवल अंकों से नहीं, बल्कि रचनात्मकता, नवाचार, नेतृत्व, खेल, अनुसंधान और सामाजिक योगदान से भी मापें।
10. मनोविज्ञान, तकनीक, कौशल और व्यवसायिक अवसरों को जोड़कर भविष्य के लिए तैयार शिक्षा व्यवस्था विकसित करें।
भविष्य के विद्यार्थी परामर्श के लिए बन सकता है आदर्श मॉडल
कार्यक्रम से निकलकर सामने आया केंद्रीय संदेश स्पष्ट था—“व्यवसायिक परामर्श व्यवसायों की सूची से नहीं, बल्कि विद्यार्थी को समझने से शुरू होना चाहिए।”
प्रधानाचार्य अरुण शर्मा ने दोनों विशेषज्ञों, विद्यार्थियों और शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विद्यालय भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करेगा। उन्होंने कहा कि तेजी से बदलते शैक्षणिक और व्यवसायिक वातावरण में विद्यार्थियों को निरंतर, वैज्ञानिक और संवेदनशील मार्गदर्शन की आवश्यकता है।
कार्यक्रम का समापन व्यक्तिगत रूपांतरण, वैज्ञानिक परामर्श, तकनीक के जिम्मेदार उपयोग और मानवीय क्षमता के विकास के संकल्प के साथ हुआ।
डीएवी सरस्वती नगर, सावरा में आयोजित यह पहल केवल एक कार्यशाला नहीं, बल्कि शिक्षा को अंक-केंद्रित व्यवस्था से प्रतिभा-केंद्रित एवं मानवीय विकास-केंद्रित व्यवस्था की ओर ले जाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास के रूप में सामने आई।








