शिमला । ‘जलवायु सहनशीलता, खाद्य सुरक्षा एवं सतत कृषि के लिए अगली पीढ़ी की पादप स्वास्थ्य रणनीतियाँ’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। इस संगोष्ठी में देशभर के प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिक, शिक्षाविद्, शोधकर्ता, विद्यार्थी एवं कृषि उद्योग जगत के प्रतिनिधि भाग लेकर जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों, उभरते पादप रोगों तथा जलवायु-अनुकूल कृषि के लिए नवीन वैज्ञानिक तकनीकों और प्रभावी रणनीतियों पर विचार-विमर्श करेंगे।
संगोष्ठी के संयोजक एवं पादप संरक्षण विभागाध्यक्ष डॉ. संजीव शर्मा ने बताया कि इस राष्ट्रीय आयोजन का संयुक्त रूप से आयोजन इंडियन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसायटी (उत्तरी क्षेत्र), इंडियन पोटैटो एसोसिएशन, शिमला, इंडियन सोसायटी ऑफ प्लांट पैथोलॉजिस्ट्स, लुधियाना, हिमालयन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसायटी, सोलन तथा भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र, शिमला द्वारा किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह में महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान के पूर्व कुलपति डॉ. एस. एस. चाहल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। वहीं उत्तर बंग कृषि विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल के पूर्व कुलपति डॉ. स्वरूप कुमार चक्रवर्ती तथा डॉ. वाई. एस. परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन के कुलपति डॉ. एच. एस. बावेजा विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम की शोभा बढ़ाएंगे।
डॉ. शर्मा ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण नए पादप रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है, जिससे कृषि उत्पादन, फसल उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं। ऐसे समय में यह राष्ट्रीय संगोष्ठी विशेष महत्त्व रखती है। इसमें पर्यावरण-अनुकूल, वैज्ञानिक एवं नवाचार आधारित पादप रोग प्रबंधन रणनीतियों के विकास तथा टिकाऊ कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जाएगा। दो दिवसीय वैज्ञानिक कार्यक्रम के अंतर्गत मुख्य व्याख्यान, आमंत्रित विशेषज्ञ व्याख्यान, तकनीकी सत्र, मौखिक एवं पोस्टर शोध प्रस्तुतियाँ तथा वैज्ञानिक पुरस्कार सत्र आयोजित किए जाएंगे। संगोष्ठी में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न पादप रोग, आणविक निदान तकनीक, जीनोमिक्स, जीनोम संपादन, जैविक नियंत्रण, समेकित रोग प्रबंधन, रोग प्रतिरोधी फसल किस्मों के विकास तथा आधुनिक एवं पर्यावरण-अनुकूल फसल संरक्षण तकनीकों जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर गहन चर्चा की जाएगी।
भाकृअनुप-केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला के निदेशक डॉ. ब्रजेश सिंह ने बताया कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का एक प्रमुख आकर्षण ‘किसान–उद्योग–शोधकर्ता–नीति निर्माता संवाद’ होगा। इसका मुख्य उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान एवं नवाचारों को किसानों के खेतों तक प्रभावी रूप से पहुँचाना तथा प्रयोगशाला से खेत तक तकनीक हस्तांतरण की प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाना है। इस विशेष संवाद मंच के माध्यम से वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं, कृषि उद्योग प्रतिनिधियों एवं किसानों के बीच सीधा विचार-विमर्श होगा, जिससे नवीन कृषि तकनीकों को अपनाने, संस्थागत सहयोग बढ़ाने तथा सतत कृषि विकास के लिए व्यावहारिक समाधान विकसित करने में सहायता मिलेगी।
संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ. संतोष वाटपाडे ने बताया कि इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के विभिन्न संस्थानों, कृषि एवं औद्यानिकी विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी), अनुसंधान संगठनों तथा प्रमुख कृषि व्यवसाय कंपनियों के प्रतिनिधि भाग लेंगे। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, मेघालय, तमिलनाडु सहित देश के विभिन्न राज्यों से वैज्ञानिक एवं शोधकर्ता अपने शोध निष्कर्षों तथा नवीन तकनीकी उपलब्धियों को प्रस्तुत करेंगे। उन्होंने बताया कि यह संगोष्ठी वैज्ञानिक ज्ञान एवं अनुभवों के आदान-प्रदान, बहुविषयक अनुसंधान सहयोग तथा नवीन पादप स्वास्थ्य प्रबंधन तकनीकों के विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच प्रदान करेगी। साथ ही, इसके माध्यम से वैज्ञानिक अनुसंधान के परिणामों को किसानों तक पहुँचाने, फसलों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से सुरक्षित रखने, कृषि उत्पादकता बढ़ाने तथा किसानों की आजीविका को सुदृढ़ बनाने की दिशा में नई संभावनाएँ विकसित होंगी।











