नशे का नासूर: लत नहीं, एक सामाजिक विनाश — मेरी आँखों देखी दास्तान

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आदर्श हिमाचल  विशेष रिपोर्ट लेखिका:
Ms. Diksha Vashisht की कलम से 
मनोविज्ञान विभाग, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी
रiज्य स्तरीय नशा विरोधी पुरस्कार प्राप्त (नशा मुक्ति एवं मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में राज्यस्तरीय सम्मान प्राप्त)
GATE Psychology क्वालिफाइड | National & State Level Awardee Himachal Pradesh

जब मैंने पहली बार एक नशे में डूबे युवा की आँखों में देखा, तो जो देखा वो सिर्फ़ सुस्ती नहीं थी — वो एक बुझती हुई आत्मा थी। वही क्षण था जब मैंने तय कर लिया कि यह लड़ाई मेरी निजी लड़ाई होगी। यह लड़ाई केवल क्लासरूम तक सीमित नहीं रह सकती थी। यह एक मिशन बन गया — नशे और अवैध तस्करी के खिलाफ, उस अंधेरे के खिलाफ, जो हमारी पीढ़ी को निगल रहा है।

 

एक शिक्षक से एक योद्धा बनने की यात्रा-
एक शिक्षिका होने के नाते मेरा पहला उद्देश्य था — पढ़ाना। लेकिन जल्द ही एहसास हुआ कि शिक्षण का दायरा सिर्फ़ किताबों और परीक्षाओं तक नहीं है। जब मेरे कुछ छात्रों ने नशे से जुड़े व्यवहार और मानसिक संघर्षों को साझा किया, तब मुझे समझ आया कि हमें केवल शैक्षणिक नहीं, सामाजिक मनोविज्ञान की लड़ाई लड़नी है।

 

मनोविज्ञान की छात्रा और शिक्षिका होने के नाते, मैंने देखा कि नशा एक लत नहीं, बल्कि एक मल्टी-लेयर साइको-सोशियल डिसऑर्डर है। यह व्यक्ति की सोच, व्यवहार, आत्म-सम्मान, संबंधों और भविष्य — हर पहलू को निगल जाता है।
पुरस्कार नहीं, पीड़ितों की आँखों में उम्मीद मेरी असली जीत है
मेरे द्वारा शुरू किए गए ‘Anti-Substance Abuse & Awareness Drives’ को न केवल विश्वविद्यालय स्तर पर सराहा गया, बल्कि मुझे राज्य स्तरीय युवा परिवर्तनकर्ता पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। मेरे शोध पत्र “Substance Use Patterns among North Indian Youth” ने कई कॉन्फ्रेंसों में प्रस्तुति पाई और मुझे GATE Psychology क्लियर करने के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य पर आधारित कार्यों के लिए अनेक मंचों पर आमंत्रित किया गया।

 

मैंने हिमाचल प्रदेश में गेयटी थिएटर (शिमला) में आयोजित राज्य स्तरीय युवा संसद में भाग लिया, जहां मेरा चयन हुआ था। वहाँ मैंने अपने विचारों के ज़रिए युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और नशा मुक्त भारत की परिकल्पना को मंच पर साझा किया। इस अनुभव ने मेरी सोच को और दृढ़ किया कि यह केवल एक विषय नहीं, बल्कि एक आंदोलन है।
लेकिन यदि आप मुझसे पूछें कि मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? तो वह एक पुनर्वास केंद्र में मिले उस युवा की मुस्कान है, जो कभी आत्महत्या के करीब था और आज एक NGO में स्वयंसेवक है।

अवैध तस्करी: छुपा हुआ राक्षस

आज हम जिस नशे की बात करते हैं, वह केवल सिगरेट या शराब तक सीमित नहीं है। अवैध तस्करी के जरिए कोकीन, हेरोइन, एमडीएमए, और सिंथेटिक ड्रग्स जैसे रसायन स्कूलों तक पहुँच चुके हैं। यह केवल एक कानून व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ़ युद्ध है।
मैंने विश्वविद्यालय और स्थानीय समुदायों में 50 से अधिक सेमिनार्स और स्ट्रीट थियेटर कार्यक्रमों का आयोजन किया है, जहां हमने युवाओं को नशे के मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव, सामाजिक बहिष्कार, और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बताया।

 

मैंने कॉलेज स्तर पर कई मेंटल हेल्थ वीक, अवेयरनेस ड्राइव्स, पोस्टर मेकिंग, और डिक्लेमेशन प्रतियोगिताएं आयोजित कीं। हर एक मंच पर मेरा उद्देश्य स्पष्ट था — जागरूकता लानी है, संवेदना जगानी है।
मैं क्या महसूस करती हूँ — एक शिक्षिका, एक महिला, एक भारतीय नागरिक के रूप में
हर बार जब कोई छात्र मेरे पास आता है और कहता है, “मैम, मुझे मदद चाहिए,” मेरे भीतर की इंसानियत काँप जाती है। मुझे लगता है, क्या हम वाकई एक सुरक्षित समाज की ओर बढ़ रहे हैं?
मुझे गुस्सा आता है, जब नशे के नेटवर्क में छोटे बच्चों का उपयोग किया जाता है। मुझे दुःख होता है, जब माता-पिता अपने बच्चों की चुप्पी को नहीं समझते। मुझे डर लगता है, जब सरकारें नीतियाँ बनाकर चुप हो जाती हैं लेकिन ज़मीनी जागरूकता शून्य होती है।
मैं चाहती हूँ कि हम हर 26 जून को केवल एक “फॉर्मल डे” की तरह न मनाएं, बल्कि इसे “जन आंदोलन” का रूप दें। यह सिर्फ़ छात्रों की समस्या नहीं, यह एक समाज की जिम्मेदारी है।

 

नारी की भूमिका: समाज में पुनर्निर्माण की कड़ी
एक महिला शिक्षिका के रूप में मैंने यह भी महसूस किया कि महिलाएं इस अभियान में एक नई ऊर्जा बन सकती हैं। मैंने विश्वविद्यालय की लड़कियों के साथ मिलकर “Sisters Against Substance Abuse” नामक अभियान शुरू किया, जहाँ हमने बालिकाओं को सशक्त किया कि वो अपने भाई, पिता, दोस्तों और सहपाठियों के नशे की आदतों को चुनौती दें।
क्या कर सकते हैं हम सब मिलकर?
शिक्षक: सिर्फ़ पाठ्यक्रम न पढ़ाएं, व्यवहार पढ़ें।
माता-पिता: बच्चों की चुप्पियों को सुनें।
प्रशासन: पुनर्वास केंद्रों की गुणवत्ता पर ध्यान दें।
युवा: एक ‘Cool’ ट्रेंड की जगह ‘Conscious’ ट्रेंड अपनाएं।

मन के कोनों में कुछ सवाल तड़पते हैं
क्या हम आने वाली पीढ़ियों को नशा मुक्त विचार दे पाएंगे?
क्या हर गाँव, हर स्कूल, हर कॉलेज में Substance Awareness Club होगा?
क्या पुनर्वास एक सज़ा नहीं, एक उम्मीद का केंद्र बन सकेगा?
यह लड़ाई अभी बाकी है…
मेरे लिए यह लड़ाई आज भी जारी है — हर दिन, हर लेख, हर सेमिनार, और हर विद्यार्थी में। जब कोई मुझसे कहता है, “मैम, आपने मेरी ज़िंदगी बचाई,” तब मुझे लगता है — मैं सही दिशा में हूँ।
लेख का अंत, लेकिन एक नई शुरुआत की पुकार
26 जून केवल एक तारीख नहीं है — यह वह दिन है जब हमें समाज के हर हिस्से को जोड़कर नशे के खिलाफ़ एक साझा संकल्प लेना चाहिए। यह समय है — नशे को शर्म का विषय नहीं, सुधार का विषय बनाने का। यह समय है — अवैध तस्करी के खिलाफ़ कार्रवाई नहीं, चेतना की जंग शुरू करने का।
और यह समय है — खुद को, समाज को, और देश को फिर से ज़िंदा करने का।