आदर्श हिमाचल ब्यूरों
पेड़ लगाना जलवायु परिवर्तन से लड़ाई का एक प्रभावशाली तरीका माना जाता रहा है, लेकिन हाल ही में Science जर्नल में प्रकाशित एक नई स्टडी ने इस धारणा को चुनौती दी है। इस अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि केवल पेड़ लगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि यह ज़रूरी है कि वृक्षारोपण सही जगह, सही प्रजातियों और टिकाऊ रणनीति के तहत हो।
इस स्टडी के अनुसार, यदि दुनिया भर में पेड़ लगाने और जंगल बहाल करने का काम वैज्ञानिक तरीकों से और ज़मीन की वास्तविक उपयोगिता को ध्यान में रखकर किया जाए, तो 2050 तक करीब 40 गीगाटन कार्बन को अवशोषित किया जा सकता है। यह पिछले दस वर्षों में वैश्विक कार्बन सिंक का लगभग 63% है। हालांकि, यह अनुमान पहले के आकलनों की तुलना में लगभग आधा है क्योंकि इसमें जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और जल संसाधनों पर संभावित प्रभावों को भी शामिल किया गया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पेड़ लगाने को लेकर किए गए 90% अंतरराष्ट्रीय वादे निम्न और मध्यम आय वाले देशों ने किए हैं, जबकि विकसित देशों ने इस दिशा में अपेक्षाकृत कम प्रतिबद्धता दिखाई है। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका के पास लगभग 25 मिलियन हेक्टेयर उपयुक्त ज़मीन है, लेकिन उसने कोई बड़ा कमिटमेंट नहीं किया है। इसके विपरीत अफ्रीकी देशों ने सीमित संसाधनों के बावजूद आधे से अधिक वृक्षारोपण वादे किए हैं, जबकि उनके पास केवल 4% उपयुक्त भूमि है।
भारत की निर्णायक भूमिका
भारत इस वैश्विक पहल में एक अहम खिलाड़ी बनकर उभरा है। स्टडी के मुताबिक देश के पास लगभग 21 मिलियन हेक्टेयर ज़मीन है, जो सतत वृक्षारोपण के लिए उपयुक्त मानी गई है। भारत पहले ही 16 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर हरित कवर बढ़ाने का कमिटमेंट कर चुका है, जो लगभग पूरे ब्रिटेन के आकार के बराबर है।
देश की मौजूदा ग्रीन कवर कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% है। 2021 से 2023 के बीच इसमें 1,445 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि, चिंता की बात यह है कि घने और जैव-विविधता युक्त पुराने जंगलों में गिरावट आ रही है। बीते दो दशकों में भारत ने 24,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक घने वनक्षेत्र गंवा दिए हैं।
सांस्कृतिक जुड़ाव और जनभागीदारी
भारत में वृक्षों से जुड़ाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। पीपल, बरगद, तुलसी जैसे पेड़ पूजा-पाठ और लोककथाओं में अहम स्थान रखते हैं। यही भावना अब अभियानों का रूप ले चुकी है, ‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे कैंपेन जनांदोलन बन चुके हैं, जिनके ज़रिए करोड़ों पौधे लगाए जा चुके हैं।सरकार भी ग्रीन इंडिया मिशन, अरावली ग्रीन वॉल जैसी पहलों के ज़रिए वृक्षारोपण को बढ़ावा दे रही है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पेड़ लगाना काफी नहीं, बल्कि उनकी प्रजातियों की विविधता, देखभाल और स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप होना भी उतना ही ज़रूरी है।
संदेश साफ है : पेड़ लगाना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है पुराने जंगलों की रक्षा और नए पौधों की सतत देखरेख करना। भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी सक्रियता दिखाई है, लेकिन असली सफलता तभी मानी जाएगी जब हर पेड़ सिर्फ गिनती में नहीं, बल्कि स्थायित्व में भी योगदान दे।