कोयला खत्म, कहानी नहीं. नेयवेली की खदानों में शुरू हुआ दूसरा जीवन

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आदर्श हिमाचल ब्यूरों  रिपोर्ट

शिमला । तमिलनाडु के कड्डालोर ज़िले में नेयवेली के आसपास का इलाका आज भी उस इंडस्ट्रियल दौर की कहानी सुनाता है जिसने कई दशकों तक भारत की एनर्जी व्यवस्था को चलाया। दूर तक फैले खुले गड्ढे, सीढ़ीनुमा मिट्टी के ढलान, और मशीनों से तराशी हुई ज़मीन यह याद दिलाती है कि लिग्नाइट माइनिंग ने इस पूरे लैंडस्केप को कितनी गहराई से बदल दिया था।लेकिन इसी मंज़र में अब एक धीमा सा बदलाव भी दिखने लगा है।कुछ जगहों पर रिक्लेम की गई ज़मीन पर हरियाली वापस आ रही है। पुराने खदान गड्ढे बारिश के पानी से भरकर छोटे जलाशयों में बदलने लगे हैं। और जहाँ कभी भारी मशीनें दिन-रात चलती थीं, वहाँ अब प्रवासी परिंदों की मौजूदगी दर्ज की जा रही है।असल में यह बदलाव भारत की क्लाइमेट कहानी के उस हिस्से की तरफ इशारा करता है जिस पर आमतौर पर बहुत कम बात होती है। कोयले का खनन खत्म हो जाने के बाद भी खदानों से बदला हुआ लैंडस्केप लंबे समय तक अपना रंग बदलता रहता है। वक्त के साथ वही ज़मीन ऐसे नए इकॉलॉजिकल और सोशल इस्तेमाल की गुंजाइश भी पैदा कर सकती है, जिनकी कल्पना माइनिंग के शुरुआती दौर में शायद किसी ने नहीं की थी।

 

नेयवेली में रिक्लेमेशन की तस्वीर

The coal is gone, but the story isn't. A new lease on life begins in the Neyveli mines.
The coal is gone, but the story isn’t. A new lease on life begins in the Neyveli mines.

सरकारी कंपनी NLC India Limited से जुड़े आंकड़े नेयवेली में चल रहे रिक्लेमेशन काम की एक झलक देते हैं।दशकों तक चले लिग्नाइट माइनिंग की वजह से लगभग 6,571 हेक्टेयर ज़मीन प्रभावित हुई। इनमें से करीब 3,236 हेक्टेयर क्षेत्र में फिजिकल रिक्लेमेशन किया गया है, जिसमें ढलानों को स्थिर करना और ज़मीन को दोबारा समतल बनाना शामिल है। इसके अलावा लगभग 2,866 हेक्टेयर क्षेत्र में बायोलॉजिकल रिक्लेमेशन के तहत करीब 34 लाख पौधे लगाए गए हैं।सरकारी रिपोर्टों में ऐसे आंकड़े अक्सर खदान बंद होने के बाद निभाई जाने वाली एनवायरनमेंटल जिम्मेदारियों के तौर पर दर्ज होते हैं। लेकिन नेयवेली का बदलता हुआ लैंडस्केप एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है। क्या माइनिंग से प्रभावित ज़मीन वक्त के साथ क्लाइमेट और एनवायरनमेंट से जुड़े नए इस्तेमाल की बुनियाद बन सकती है?

धीरे धीरे लौटती इकॉलॉजी

नेयवेली की कई रिक्लेम की गई खदानों में अब वनस्पति धीरे धीरे स्थिर होने लगी है। शुरुआत में जो कोशिशें सिर्फ मिट्टी को संभालने और ढलानों को स्थिर करने के लिए की गई थीं, वही अब पुराने माइनिंग इलाकों में फैलती हरियाली के रूप में दिखाई देने लगी हैं।इन इलाकों में परिंदों की संख्या और उनकी विविधता भी बढ़ने लगी है। स्थानीय ऑब्ज़र्वेशन के मुताबिक यहाँ 100 से ज़्यादा प्रवासी पक्षी प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं, जिनमें एशियन कोयल और पैराडाइज फ्लाईकैचर जैसे परिंदे शामिल हैं।यह बदलाव इस बात का इशारा देता है कि जो इलाका कभी पूरी तरह उजाड़ लगता था, वहाँ इकॉलॉजिकल एक्टिविटी धीरे धीरे लौट रही है।

 

रिक्लेम की गई खदानों से एक सीमित क्लाइमेट फायदा कार्बन एब्जॉर्प्शन के रूप में भी सामने आ सकता है। माइनिंग इलाकों में ट्री प्लांटेशन पर किए गए स्टडीज़ के अनुसार ऐसी ज़मीन हर साल प्रति हेक्टेयर लगभग 0.5 से 1 टन कार्बन एब्जॉर्ब कर सकती है।अगर यही अनुमान नेयवेली के रिफॉरेस्टेशन क्षेत्रों पर लागू किया जाए, तो यह लगभग 1,400 से 3,000 टन कार्बन डाइऑक्साइड इक्विवेलेंट सालाना एब्जॉर्प्शन के बराबर हो सकता है।बेशक यह मात्रा कोयला आधारित बिजली उत्पादन से होने वाले उत्सर्जन के मुकाबले बहुत कम है। लेकिन अगर भारत के दूसरे कोयला इलाकों में भी इसी तरह के रिक्लेमेशन मॉडल अपनाए जाएँ, तो इसका कुल असर कहीं बड़ा हो सकता है।

खदानों के गड्ढों से बने पानी के स्रोत

नेयवेली के बदलते लैंडस्केप का एक अहम पहलू पानी से भी जुड़ा है।माइनिंग के दौरान बने बड़े गड्ढे समय के साथ रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से जुड़कर जलाशयों में बदल गए हैं। आज यही जलाशय आसपास के इलाकों को हर दिन लगभग 975 लाख लीटर पानी उपलब्ध करा रहे हैं।इनमें से करीब 550 लाख लीटर पानी आसपास के गाँवों को घरेलू इस्तेमाल और सिंचाई के लिए दिया जाता है। वहीं लगभग 425 लाख लीटर पानी राज्य की वॉटर सप्लाई सिस्टम के ज़रिये कड्डालोर ज़िले के करीब 7.9 लाख लोगों तक पहुँचता है, जहाँ अक्सर मौसमी पानी की कमी देखने को मिलती है।ऐसे इलाकों में जहाँ पानी सीधे खेती और ग्रामीण ज़िंदगी को प्रभावित करता है, ये जलाशय सूखे के महीनों में एक अहम सहारा बन सकते हैं।हालाँकि पुरानी खदानों में बने इन जल स्रोतों की क्वालिटी पर लगातार निगरानी भी ज़रूरी रहती है, क्योंकि कुछ मामलों में खनिज तत्व पानी की केमिकल संरचना को प्रभावित कर सकते हैं।

माइनिंग वेस्ट से नया संसाधन

माइनिंग से निकला वेस्ट भी अब नए इस्तेमाल की दिशा में देखा जा रहा है।लिग्नाइट माइनिंग के दौरान हटाई गई भारी मात्रा में मिट्टी और चट्टान को पहले बेकार समझा जाता था। अब रिसर्च कोलैबोरेशन के ज़रिये इसे कंस्ट्रक्शन सेक्टर के लिए मैन्युफैक्चर्ड सैंड में बदलने के प्रयोग किए गए हैं।Indian Institute of Technology Madras के वैज्ञानिकों के साथ किए गए परीक्षणों से संकेत मिला है कि माइनिंग के दौरान निकाले गए ओवरबर्डन का 40 से 60 प्रतिशत हिस्सा उपयोगी रेत में बदला जा सकता है।नेयवेली परिसर में स्थापित प्रोसेसिंग यूनिट्स अब हर साल लगभग 9 लाख घन मीटर मैन्युफैक्चर्ड सैंड तैयार कर रही हैं।ऐसे समय में जब कई राज्यों में नदी की रेत का अत्यधिक दोहन एक बड़ी एनवायरनमेंटल समस्या बन चुका है, यह पहल माइनिंग वेस्ट के वैकल्पिक इस्तेमाल की एक दिलचस्प संभावना दिखाती है।

 

दुनिया के दूसरे कोयला इलाकों से मिलते संकेत

 

दुनिया के कई हिस्सों में माइनिंग के बाद लैंडस्केप में बड़े बदलाव देखे गए हैं।जर्मनी के पूर्वी हिस्से में स्थित Lusatia क्षेत्र में बंद हो चुकी लिग्नाइट खदानों को कई दशकों में बदलकर 20 से ज़्यादा कृत्रिम झीलों के नेटवर्क में तब्दील किया गया है। यह पूरा इलाका करीब 1,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।इस बदलाव के लिए 10 अरब यूरो से ज़्यादा सार्वजनिक निवेश किया गया। इसके बाद यह क्षेत्र टूरिज़्म और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का नया केंद्र बन गया।संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ इलाकों में रिक्लेम की गई खदानों की ज़मीन पर सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट भी लगाए जा रहे हैं। पहले से मौजूद ज़मीन और बिजली ग्रिड से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर ऐसे स्थानों को रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट के लिए उपयुक्त बना देता है।भारत में अभी ऐसी संभावनाएँ शुरुआती स्तर पर ही दिखाई देती हैं। नेयवेली में चल रहे प्रयास इस दिशा में एक शुरुआती उदाहरण माने जा सकते हैं।

 

क्लाइमेट पॉलिसी में रिक्लेम की गई ज़मीन की भूमिका

 

भारत के कोयला क्षेत्र झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों में फैले हुए हैं, जहाँ दशकों के ओपन कास्ट माइनिंग ने हजारों हेक्टेयर ज़मीन को बदल दिया है।इनमें से कई इलाके पहले से ट्रांसपोर्ट रूट, इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर और बिजली नेटवर्क से जुड़े हुए हैं। ऐसे देश में जहाँ नई परियोजनाओं के लिए लैंड एक्विज़िशन अक्सर मुश्किल और विवादास्पद हो जाता है, रिक्लेम की गई माइनिंग ज़मीन एक अहम विकल्प बन सकती है।समय के साथ ये क्षेत्र कई क्लाइमेट लक्ष्यों में योगदान दे सकते हैं। रिफॉरेस्टेशन जैव विविधता को बढ़ावा दे सकता है और सीमित स्तर पर कार्बन एब्जॉर्प्शन में मदद कर सकता है। खदानों में बने जलाशय क्षेत्रीय जल संसाधनों को मज़बूत कर सकते हैं। और मौजूदा इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट के लिए भी काम आ सकता है ्हालाँकि इसके लिए लंबी अवधि की योजना, एनवायरनमेंटल मॉनिटरिंग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद ज़रूरी होगी।

बदलता हुआ कोयला लैंडस्केप

पिछली सदी में भारत की कोयला अर्थव्यवस्था ने विशाल भू-भागों को बदल दिया। उस बदलाव के निशान खदानों के बंद होने के बाद भी लंबे समय तक दिखाई देते रहेंगे।नेयवेली में वही निशान अब एक नए रूप में सामने आ रहे हैं। रिक्लेम की गई ढलानों पर हरियाली उग रही है। पुराने गड्ढों में जलाशय बन चुके हैं। और माइनिंग वेस्ट धीरे धीरे नए इंडस्ट्रियल इस्तेमाल की तरफ बढ़ रहा है।भारत का एनर्जी ट्रांज़िशन आखिरकार बिजली उत्पादन के तरीकों को बदलेगा। लेकिन कोयला माइनिंग से बने लैंडस्केप एक और अहम सवाल खड़ा करते हैं।

 

भारत अपने ऊर्जा विकास की इस एनवायरनमेंटल विरासत को किस तरह संभालेगा।नेयवेली जैसे स्थानों में यह विरासत शायद धीरे धीरे एक नए जीवन की संभावना दिखा रही है।और इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आता हैजब भारत रिन्यूएबल एनर्जी और क्लाइमेट अडैप्टेशन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो क्या रिक्लेम की गई कोयला खनन भूमि को भी राष्ट्रीय क्लाइमेट स्ट्रेटेजी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए