आदर्श हिमाचल ब्यूरो
शिमला। किसी भी समाज के सांस्कृतिक जीवन का सही रूप मेले व त्यौहारों के अवसर पर देखने को मिलता है। इन्हीं से उसे क्षेत्र की लोक परंपरा, इतिहास, सामाजिक परिवेश का प्रतिबिंब उभरता है। यही लोगों के वर्तमान को अतीत से बांधकर, उनकी मूल परंपराओं को बनाए रखते हैं। मेलों का संबंध प्रायः त्योहार से ही होता है और त्योहारों का वर्ष के विशेष दिनों, ऋतु परिवर्तन, फसल के आगमन, धार्मिक आस्था या किसी महापुरुष के स्मरण से रहता है। हिमाचल प्रदेश में समय-समय पर आयोजित इन मेलों और त्योहारों के पीछे कोई ना कोई पौराणिक, ऐतिहासिक, धार्मिक या चमत्कारिक घटना अवश्य रहती है।
देवी देवताओं की स्थापना कोई चमत्कार दिखना या निवारण ही इन मेलों के स्रोत है। दीपावली, बुढ़ी दीपावली, गोवर्धन पूजा, लोहड़ी, दशहरा, जन्माष्टमी, बिशु , बैसाखी, तीज, जागरण, जातर, होली, चिड़ा आदि कुछ मुख्य त्यौहार हैं जो हिमाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न समय पर आयोजित किए जाते हैं। इनमें से कुछ एक का मनाने का ढंग अलग हो सकता है। हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र किन्नौर तथा लाहौल स्पीति में फूलों का त्योहार बहुत प्रसिद्ध है। लोसर, नग्न शिल्पा तथा जीजा इस क्षेत्र के प्रसिद्ध त्यौहार है। हिमाचल प्रदेश के प्रत्येक गांव में देवी या देवता की स्थापना का होना भी आम बात है। मूलतः मेलों का संबंध इन्हीं देवी देवताओं से रहता है। इन्हीं के साथ मुख्य रूप से त्योहार भी जुड़े हुए हैं जैसे दशहरा, नवरात्रि, शिवरात्रि, होली व दीपावली आदि।
वैसे तो हिमाचल प्रदेश में असंख्य मेले लगते हैं, परंतु मुख्य मेले हैं-कल्लू का दशहरा, मंडी की शिवरात्रि, चंबा का मंजर, बिलासपुर का श्री नैना देवी का मेला, कांगड़ा का मां ब्रजेश्वरी का मेला, उना का मां चिंतपूर्णी मेला, रामपुर बुशहर में लवी, सिरमौर का रेणुका मेला तथा सुजानपुर की होली आदि विशेष रूप से विख्यात है। इसके अतिरिक्त अन्य स्थानीय मेले भी लगते हैं जो पराया बसंत रितु से आरंभ होते हैं। प्रदेश के निचले क्षेत्रों में जहां पशु विक्रय की प्रधानता रहती है, वहीं ऊपरी भाग में तीरंदाजी, ठोडा आदि चलाने का प्रदर्शन रहता है। शिमला के ऊपरी भाग, कुल्लू मंडी आदि क्षेत्रों में स्थानीय देवी देवताओं को पालकियों में सजाकर मेलों में लाया जाता है। देवताओं के साथ रण सिंह, कनाले, ढोल नगाड़े, शहनाई आदि वाद्य यंत्र इन मेलों में समां बांधते हैं।
इन वाद्य यंत्रों का विशेष प्रदर्शन राज्य स्तरीय शिमला जिले के रोहड़ू मेले में भी देखने को मिलता है। इन वाद्य यंत्रों की मधुर लय समस्त वातावरण में नई ऊर्जा का संचार करती है। देवताओं के महत्व एवं मान्यता क्षेत्र के अनुसार ही उनकी मूर्तियां सोने, चांदी, पीतल या तांबे की बनाई जाती है। जिसमें इन क्षेत्र की समृद्धि मूर्ति वास्तुकला दृष्टिगोचर होती है। इन मेलों तथा त्योहारों में हिमाचली लोक नृत्य, लोकगीत, परिधान, आभूषण आदि विशेष रंग बिखरते हैं। साथ ही साथ दूर दराज के इलाकों में बैठे संबंधियों से मेल-जोल मेलों में अनायास ही हो जाता है।











