आदर्श हिमाचल ब्यूरो
शिमला । आधुनिक और भागदौड़ भरे दौर में युवाओं को अध्यात्म से जोड़ने तथा उन्हें नशे जैसी सामाजिक बुराइयों से दूर रखने के उद्देश्य से श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ एवं आध्यात्मिक अनुष्ठान का शुभारंभ शुक्रवार को शिमला विश्वविद्यालय (एपीजी) के मंदिर परिसर में हुआ। यह आयोजन संस्कृत गुरुकुल पंचकूला के परम श्रद्धेय स्वामी श्री निवासाचार्य के सानिध्य में आयोजित किया जा रहा है।
मंदिर परिसर में पहुंचे स्वामी श्री निवासाचार्य का विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से भव्य स्वागत किया गया। कथा के प्रथम दिन व्यास गद्दी से स्वामी जी ने श्रद्धालुओं, स्थानीय लोगों, विद्यार्थियों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए श्रीमद्भागवत महापुराण की महिमा एवं आध्यात्मिक ज्ञान के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
स्वामी श्री निवासाचार्य ने कहा कि वर्तमान समय में युवा वर्ग मानसिक तनाव, अनिश्चितता और नशे जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में आध्यात्मिक ज्ञान जीवन को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक बन सकता है। उन्होंने कहा कि अध्यात्म व्यक्ति को जीवन की आपाधापी के बीच भी मानसिक शांति, आत्मबल और संतुलन बनाए रखना सिखाता है।
उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा का हिस्सा बनाए जाने को एक युगांतकारी पहल बताते हुए कहा कि इससे युवा अपनी संस्कृति, गौरवशाली इतिहास और ऋषि-मुनियों की शिक्षाओं से जुड़ सकेंगे। उन्होंने कहा कि धर्मग्रंथों, वेदों और पुराणों में निहित जीवन मूल्यों से प्रेरणा लेकर युवा न केवल तकनीकी रूप से सक्षम बनेंगे, बल्कि नैतिक रूप से भी सुदृढ़ होंगे।
स्वामी जी ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन अपनाकर वैश्विक बुराइयों, द्वेष और अनैतिकता का समाधान संभव है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहकर मानवहित और राष्ट्र निर्माण के लिए भी कार्य करें।
उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के दौरान भगवद्गीता के “कर्मण्येवाधिकारस्ते” और “समत्वं योग उच्यते” जैसे सूत्रों ने लोगों को मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखा। गीता का संदेश आज भी युवाओं को सकारात्मक सोच, संतुलन और कर्म के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है।
स्वामी श्री निवासाचार्य ने बताया कि श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ एक सप्ताह तक चलेगा, जिसमें प्रतिदिन विभिन्न कथा प्रसंगों के माध्यम से जीवन प्रबंधन और आध्यात्मिक मूल्यों की सीख दी जाएगी। कथा के अंतर्गत नंदोत्सव, गोवर्धन पूजा, रुक्मिणी मंगल एवं सुदामा चरित्र जैसे विशेष उत्सव भी आयोजित किए जाएंगे।
उन्होंने श्रद्धालुओं एवं अभिभावकों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को ऐसे आध्यात्मिक आयोजनों से अवश्य जोड़ें ताकि युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति और नैतिक मूल्यों से परिचित हो सके।
शिमला विश्वविद्यालय (एपीजी) प्रबंधन ने कहा कि भागवत कथा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि युवाओं में सकारात्मक सोच, आत्मअनुशासन, नैतिक मूल्यों और मानसिक शांति विकसित करने का प्रभावशाली माध्यम है। विश्वविद्यालय प्रबंधन ने स्थानीय लोगों, विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं श्रद्धालुओं से इस आध्यात्मिक आयोजन में सहभागिता का आग्रह किया है।











