एपीजी विश्वविद्यालय में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब, स्वामी निवासाचार्य ने बताया — भक्ति ही जीवन की सच्ची शक्ति

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आदर्श हिमाचल ब्यूरों 

​शिमला। विश्वविद्यालय (एपीजी) के मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय ‘श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ’ के तीसरे दिन रविवार को श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। कथावाचक स्वामी निवासाचार्य ने आज के व्याख्यान में भक्ति को केवल बुढ़ापे की वस्तु न मानकर, उसे युवाओं की ऊर्जा और जीवन जीने की कला से जोड़कर प्रस्तुत किया। कथा के मुख्य अंश जो युवाओं और विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा हैं। स्वामी निवासाचार्य ने बड़े ही तर्कसंगत ढंग से बताया कि आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि एक मानसिक अनुशासन है।

 

 

स्वामी निवासाचार्य ने कहा कि बचपन से ही प्रभु का ध्यान क्यों? जैसे कच्ची मिट्टी को मनचाहा आकार दिया जा सकता है, वैसे ही बचपन और युवावस्था में संस्कार डालने से भविष्य उज्ज्वल होता है। स्वामी निवासाचार्य ने श्रद्धालुओं और युवाओं को संदेश दिया कि सफलता के शिखर पर पहुँचने के लिए ‘राम की कृपा’ और ‘तुलसी के धैर्य’ जैसे गुणों की आवश्यकता है।

 

​मृत्युतुल्य कौन है? कथा के दौरान एक कड़वा सत्य साझा करते हुए स्वामी निवासाचार्य ने कहा कि केवल सांसों का रुकना मृत्यु नहीं है। जिस व्यक्ति के हृदय में भगवान के प्रति प्रेम और समाज के प्रति सद्भाव नहीं है, वह जीवित होते हुए भी ‘मृत्युतुल्य’ है। प्रणाम का विज्ञान क्या है? पैर छूने की परंपरा को स्वामी जी ने झुकने की कला और अहंकार के नाश से जोड़ा। उन्होंने बताया कि जब हम बड़ों के चरण स्पर्श करते हैं, तो यह केवल आशीर्वाद नहीं, बल्कि ऊर्जा का आदान-प्रदान और विनम्रता का प्रतीक है।

 

स्वामी निवासाचार्य ने स्पष्ट किया कि परमात्मा का धाम कोई भौगोलिक सीमा नहीं है। जहाँ प्रभु की लीलाएँ होती हैं, जहाँ उनके गुणों का गान होता है, वही स्थान ‘धाम’ बन जाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे अपने हृदय को ही ऐसा धाम बनाएँ जहाँ ईश्वर निवास कर सकें।

 

​स्वामी निवासाचार्य ने बताया कि हम भगवान के थे, भगवान के हैं और सदा भगवान के ही रहेंगे। यह अटूट विश्वास ही मनुष्य को हर संकट से लड़ने की शक्ति देता है। विश्वविद्यालय के मंदिर परिसर में आयोजित इस भागवत कथा ज्ञानयज्ञ में बड़ी संख्या में ब्यौलिया ग्राम पंचायत के आसपास के ग्रामीण लोग और शिक्षक और छात्र- छात्राएं भी भाग ले रहे हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि स्वामी निवासाचार्य की वाणी आधुनिक जटिलताओं को सुलझाने में सहायक सिद्ध है। कथा के अंत में सामूहिक आरती और प्रसाद वितरण किया गया।