आदर्श हिमाचल ब्यूरों
शिमला । (एपीजी)के शांत, सुरम्य और पवित्र मंदिर परिसर में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के पांचवें दिन मंगलवार को पुनः भक्ति का सैलाब उमड़ पड़ा। कुलगुरु पंचकुला से पधारे प्रसिद्ध कथावाचक एवं शास्त्रों और संस्कृत विद्वान स्वामी निवासाचार्य ने अपनी ओजस्वी वाणी से भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का सजीव चित्रण किया, जिसे सुनकर उपस्थित श्रद्धालु, स्थानीय लोग, विद्यार्थी व शिक्षकवर्ग भावविभोर हो उठे।
स्वामी निवासाचार्य ने आध्यात्मिक शिक्षा को व्यावहारिक जीवन से जोड़ते हुए कहा कि विवेक ही वह प्रकाश है जो मनुष्य को सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है। स्वामी निवासाचार्य ने आत्मा का जागरण बारे समझाया कि जिन्होंने अपनी आत्मा को पहचान लिया, उन्हें ही परमात्मा की विशेष कृपा प्राप्त होती है। स्वामी निवासाचार्य ने सम्मान का आधार क्या है , इस विषय पर कहा कि एक ज्ञानी व्यक्ति अपनी पद-प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि अपने ज्ञान और आचरण से हर जगह सम्मान पाता है। वहीं स्वामी निवासाचार्य ने वाणी की मधुरता बारे में भी बताया कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल साक्षर होना नहीं, बल्कि वाणी में वह मधुरता लाना है जो समाज को जोड़ सके।
नारी सम्मान पर जोर देते हुए स्वामी निवासाचार्य ने कहा कि नारी परिवार, समाज और राष्ट्र की प्रगति की रीढ़ है।वहीं कथा के दौरान स्वामी निवासाचार्य ने सामाजिक शिक्षा पर जोर देते हुए कहा— “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है।उन्होंने विद्यार्थियों और युवाओं को प्रेरित किया कि एक सभ्य और शिक्षित समाज वही है जहाँ नारी को पूर्ण आदर और सुरक्षा प्राप्त हो।
भागवत कथा ज्ञानयज्ञ का पांचवा दिवस गोवर्धन पूजा और छप्पन भोग का दिव्य आयोजन विशेष रूप से ‘गोवर्धन पूजा’ को समर्पित रहा। स्वामी निवासाचार्य ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इंद्र का मान-मर्दन कर प्रकृति की रक्षा का संदेश दिया गया, जो आज के युग में पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा देता है। प्रभु को छप्पन भोग अर्पित किए गए, जिसमें विश्वविद्यालय परिवार और श्रद्धालुओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। स्वामी निवासाचार्य ने बताया कि भगवान विष्णु होकर भी प्रभु ने बालक रूप में लीलाएं कीं ताकि वे भक्तों का उद्धार और दुष्टों का संहार कर सकें।
स्वामी ने कहा कि शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण है। भागवत कथा जैसे आयोजन विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करते हैं। स्वामी निवासाचार्य ने कहा कि शिमला विश्वविद्यालय (एपीजी) में चल रहे ज्ञानयज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाली एक जीवंत पाठशाला बन गया है। यहाँ “सा विद्या या विमुक्तये” (शिक्षा वही है जो मुक्ति दिलाए) के ध्येय को चरितार्थ होते देखा जा रहा है। यह विश्वविद्यालय का सौभाग्य प्राप्त हुआ कि इस तरह के प्रभु के ज्ञानयज्ञ का अवसर मिला।











