कांग्रेस में बढ़ती गुटबाजी, 2027 चुनाव से पहले संगठन के सामने बड़ी चुनौती

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आदर्श हिमाचल ब्यूरों 

शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में हर पांच वर्ष बाद सत्ता परिवर्तन की परंपरा रही है, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की सफलता उसके संगठन की मजबूती, जमीनी कार्यकर्ताओं की सक्रियता और नेतृत्व की कार्यशैली पर निर्भर करती है। वर्तमान समय में प्रदेश कांग्रेस के भीतर बढ़ती गुटबाजी, नेताओं के बीच मतभेद और कार्यकर्ताओं की कथित अनदेखी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।

 

 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री और सरकार को पार्टी संगठन तथा कार्यकर्ताओं के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता है। कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और नेताओं के बीच तालमेल की कमी भविष्य में पार्टी के लिए चुनौती बन सकती है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस के सामने संगठन को मजबूत करने और आंतरिक मतभेदों को समाप्त करने की बड़ी जिम्मेदारी है।

 

 

विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में स्वर्गीय Virbhadra Singh की राजनीतिक विरासत, कांग्रेस संगठन की एकजुटता और कार्यकर्ताओं की मेहनत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज भी वीरभद्र परिवार का प्रभाव प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

 

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी बनी हुई है कि लोक निर्माण मंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता Vikramaditya Singh की लोकप्रियता प्रदेशभर में बढ़ रही है। युवा वर्ग के साथ-साथ कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में भी उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। वहीं होली लॉज को प्रदेश कांग्रेस की राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता रहा है, जिसका पार्टी की दिशा और रणनीति पर लंबे समय से प्रभाव रहा है।

 

 

वर्तमान परिदृश्य में पूर्व विधायक एवं पूर्व मुख्य संसदीय सचिव Neeraj Bharti का नाम भी चर्चा में है। कांगड़ा की राजनीति में उनकी एक अलग पहचान रही है और युवाओं के बीच उनका प्रभाव माना जाता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि ऐसे जनाधार वाले नेताओं की उपेक्षा या संगठन से दूरी कार्यकर्ताओं में असंतोष का कारण बन सकती है।

 

 

पिछले कुछ वर्षों के दौरान कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं जैसे हर्ष महाजन ,सुधींर शर्मा ,राजिंदर राणा  और कार्यकर्ताओं का पार्टी छोड़कर अन्य दलों में जाना भी संगठन के लिए चिंता का विषय रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि समय रहते संगठनात्मक स्तर पर संवाद और समन्वय को मजबूत नहीं किया गया तो इसका असर पार्टी की एकजुटता पर पड़ सकता है।

 

इसके अतिरिक्त सरकार और संगठन के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए जिन कुछ व्यक्तियों को जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं, उनके अपेक्षित परिणाम न दे पाने की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में सुनने को मिल रही हैं। इससे सरकार, संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच संवाद को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

 

 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस को वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में मजबूत स्थिति बनाए रखनी है तो संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना होगा। कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को प्राथमिकता देनी होगी तथा सभी वरिष्ठ और जनाधार वाले नेताओं को साथ लेकर चलने की रणनीति अपनानी होगी। यही पार्टी की एकजुटता और भविष्य की सफलता का आधार बन सकता है।

 

 

हालांकि कांग्रेस नेतृत्व की ओर से समय-समय पर यह दावा किया जाता रहा है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और सरकार जनता से जुड़े मुद्दों पर प्रभावी ढंग से कार्य कर रही है। ऐसे में आने वाले समय में पार्टी किस प्रकार संगठनात्मक चुनौतियों से निपटती है, इस पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर बनी रहेगी।