विशेष रिपोर्ट
शिमला । प्रोफेसर हैराल्ड ज़ुर हाउज़ेन को 2008 में उनकी इस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला कि ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) के हाई-रिस्क स्ट्रेन से लगातार होने वाला संक्रमण ही सर्वाइकल कैंसर का मूलभूत कारण है। यह दुनिया भर में रुग्णता और मृत्यु का एक महत्वपूर्ण कारण है, लेकिन कम और निम्न-मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) में इसका प्रभाव अधिक है। उनकी इस खोज ने रोगनिरोधी टीकों के साथ-साथ संक्रमण फैलाने वाले एजेंट का पता लगाने वाले परीक्षणों के विकास का भी मार्ग प्रशस्त किया। एक दशक बाद, 2018 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन
(डब्ल्यूएचओ) ने सर्वाइकल कैंसर के उन्मूलन की दिशा में एक पहल की घोषणा की, और 17 नवंबर 2020 को इस संबंध में एक वैश्विक रणनीति औपचारिक रूप से शुरू की गई, जिसे भारत सहित 194 देशों ने समर्थन दिया । कैंसर का उन्मूलन! वह भी कोई साधारण कैंसर नहीं, बल्कि सर्वाइकल कैंसर का उन्मूलन, जो अत्यधिक शारीरिक पीड़ा, भावनात्मक संघर्ष और आर्थिक कठिनाइयों का सबब है। भारत में महिलाओं में यह में दूसरा सबसे आम कैंसर है। हर साल इसके लगभग एक लाख नए मामले सामने आते हैं और इनमें से करीब आधे मामलों में मौत हो जाती है, जो दुनिया भर के कैंसर के बोझ का लगभग एक-चौथाई है। सर्वाइकल कैंसर में जीवन के खोए हुए वर्ष, अन्य कैंसरों की तुलना में अधिक होते हैं, क्योंकि पीडि़त महिलाएँ अपेक्षाकृत कम उम्र की होती हैं और परिवार व समाज महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही होती हैं। कैंसर विशेषज्ञ के रूप में, मैंने उनकी तकलीफों को करीब से देखा है.. ऐसी महिलाएँ जिनमें चौथी स्टेज में इस रोग का पता चला, उनमें यूरिनरी फिस्टुला विकसित हो चुका था और कंसल्टिंग रूम में उनके दाखिल होने से पहले ही बदबू आने लगती थी; ऐसी महिलाएँ जो रजोनिवृत्ति के बाद होने वाले रक्तस्राव का जिक्र करने में तब तक हिचकिचाती रहीं, जब तक कि बहू ने उनकी साड़ी पर दाग नहीं देख लिया; ऐसी महिलाएँ जो अत्यधिक सायटिक और कमर दर्द, मूत्रवाहिनी या यूरेटर में रुकावट और गुर्दे फेल होने जैसी स्थितियों से जूझ रही थीं… फिर कुछ अपेक्षाकृत भाग्यशाली महिलाएँ भी थीं, जिन्हें शुरुआती अवस्था ही इस रोग से ग्रसित होने के बारे में पता चल गया और जब यह बीमारी ठीक हो सकती थी, लेकिन सिर्फ़ रेडिकल सर्जरी या कीमो- और रेडिएशन थेरेपी से… ऐसे में गहन या एग्रेसिव सर्जरी का शरीर पर असर हुआ, लंबे समय तक चले रेडिएशन उपचार के कारण देखभाल करने वालों को पढ़ाई या काम से वंचित रहना पड़ा, और महंगी कीमो व इम्यूनोथेरेपी हुई… इसके अलावा, हमारे हरसंभव प्रयासों के बावजूद कुछ मामलों में कैंसर दोबारा लौट आया, जिसके लिए और भी जटिल प्रक्रियाओं, जैसे एक्सेंटरेशन सर्जरी और स्टोमा आदि की आवश्यकता पड़ी। हाँ, हम इलाज कर सकते थे, लक्षणों में राहत दे सकते थे, यहां तक कि हार्मोन रिप्लेसमेंट और अन्य सहायक देखभाल भी दे सकते थे, लेकिन इसकी शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक कीमत चुकानी होती।
और भी दुखद बात यह थी कि इस बीमारी की रोकथाम की जा सकती थी। 1940 के दशक से ही पश्चिमी देशों में नियमित पैप स्मीयर जांच के माध्यम से द्वितीयक रोकथाम की व्यवस्था की गई थी, जिससे न केवल कैंसर का पता लगाया जा सकता था, बल्कि रोग की प्रारंभिक अवस्थाओं का भी पता लगाया जा सकता था। सर्वाइकल कैंसर की नेचुरल हिस्ट्री को एक सदी से अधिक समय से अच्छी तरह से दर्ज किया गया है। इसमें 10–15 वर्षों का लंबा प्रीकैंसरस चरण होता है, जिसे सर्वाइकल इंट्राअपिथीलियल नियोप्लासिया (सीआईएन) कहा जाता है, गर्भाशय ग्रीवा या सर्विक्स को ब्रश करके स्लाइड पर इकट्ठा की गई कोशिकाओं की माइक्रोस्कोप से जांच करके जिसका पता लगाया जा सकता है। इस अवस्था में इस रोग का उपचार सरल डे-केयर प्रक्रियाओं के जरिए आसानी से किया जा सकता है, जिनमें गर्भाशय निकालने की आवश्यकता नहीं होती।
भारत और अन्य निम्न-मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) में हमारे पास इतनी बुनियादी सुविधाएँ और प्रशिक्षित जनशक्ति नहीं थी कि 30 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं की जीवन में एक बार भी जांच की जा सके, जबकि हर 3 साल के अंतराल पर यह जांच कराने की सलाह दी गई थी। यहाँ तक कि अच्छे तृतीयक केंद्रों में भी प्रयोगशालाएँ प्रतिदिन सीमित संख्या में ही महिलाओं की जांच कर पाती थीं। देशभर में स्त्रीरोग विशेषज्ञों और पैथोलॉजिस्ट द्वारा नियमित रूप से आउटरीच कैंप आयोजित किए जाते थे, ताकि वंचितों की मदद की जा सके, लेकिन ये प्रयास समुद्र में एक बूंद के समान थे। यहाँ तक कि आज भी, विजुअल इंस्पेक्शन (वीआईए) के माध्यम से राष्ट्रीय स्क्रीनिंग कार्यक्रम होने के बावजूद, स्क्रीनिंग कवरेज 5% से अधिक नहीं है, और जिन महिलाओं का टेस्ट पॉजिटिव पाया जाता है, उन्हें अस्पताल लाकर रोग की पुष्टि के लिए बायोप्सी और उपचार कराना भी बेहद कठिन होता है।
सर्वाइकल कैंसर की प्राथमिक रोकथाम के लिए एचपीवी टीकाकरण ने 2006 में एक उम्मीद भरे सुपरहीरो की तरह इस परिदृश्य में प्रवेश किया। शुरुआत में यह तीन खुराक वाला टीका था, लेकिन लगातार शोध से यह साबित हुआ कि इसे दो खुराक तक घटाया जा सकता है, और आगे चलकर यह भी पाया गया कि केवल एक खुराक ही 85–90% कैंसर से सुरक्षा देने के लिए पर्याप्त है। एक साधारण सा इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन इतनी बड़ी तकलीफ से बचा सकता है?! यह वास्तव में बेहद उत्साहजनक संभावना थी। रोकथाम के लिए टीकाकरण में सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता है। अब तक 500 मिलियन से अधिक खुराकें दुनिया भर में और लगभग 4 मिलियन खुराकें भारत में दी जा चुकी हैं। व्यवस्थित परीक्षणों और पोस्ट-मार्केटिंग सर्विलांस से प्राप्त समेकित आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि टीका लगवाने वाली महिलाओं में सामान्य आबादी की तुलना में प्रतिकूल प्रभावों में कोई वृद्धि नहीं हुई है। उनमें क्षणिक हल्की प्रतिक्रियाएँ देखी गई हैं, जो सभी टीकों में सामान्य होती हैं। इन टीकों का प्रजनन क्षमता, जन्म दर, जन्मजात विकृतियों या मासिक धर्म के पैटर्न पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पाया गया है। एचपीवी टीकों की प्रभावशीलता बहुत अच्छी है, क्योंकि ये टीके उनमें शामिल वायरस के प्रकारों से लगभग पूरी तरह सुरक्षा प्रदान करते हैं। पहली पीढ़ी के टीके एचपीवी के दो सबसे खतरनाक प्रकारों — एचपीवी 16 और 18—के खिलाफ बनाए गए थे, जो वैश्विक स्तर पर सर्वाइकल कैंसर के 70% और भारत में लगभग 85% मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों, जिन्होंने 2007–08 में इस टीके के शुरू होने के तुरंत बाद ही एचपीवी टीकाकरण लागू कर दिया था, वहाँ प्रीकैंसर तथा कैंसर के मामलों में महत्वपूर्ण कमी देखी गई है।
स्वीडन, डेनमार्क, कनाडा और अमेरिका जैसे अन्य देशों से भी इसी तरह के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। डब्ल्यूएचओ की सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन पहल का लक्ष्य सर्वाइकल कैंसर को एक दुर्लभ कैंसर बनाना है, जिसके होने की दर प्रति 1 लाख में केवल 4 मामलों तक सीमित हो। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2030 तक : 15 वर्ष की आयु से पहले 90% लड़कियों का एचपीवी टीकाकरण, 35 और 45 वर्ष की आयु में 70% महिलाओं की एचपीवी परीक्षण द्वारा स्क्रीनिंग, और जिन महिलाओं में रोग के लक्षण पाए जाएं, उनमें से 90% का उपचार – जैसे कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्यों को हासिल करना आवश्यक है। वैश्विक घोषणा के शुरू होने के बाद से हम आधे से अधिक रास्ता पार कर चुके हैं, लेकिन अभी भी इन लक्ष्यों की प्राप्ति से काफी दूर हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी ऑफ इंडिया (एफओजीएसआई) और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी) जैसे संगठनों के प्रतिनिधित्व वाला चिकित्सा समुदाय लंबे अरसे से एचपीवी टीकाकरण को सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किए जाने की मांग कर रहा है। आखिरकार, अब उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है— माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 28 फरवरी 2026 को राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण अभियान को देशव्यापी स्तर पर लॉन्च किया जाना- महिलाओं के स्वास्थ्य और प्रजनन अधिकारों को महत्व दिलाने की दिशा में सर्वोच्च राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत है, जिसकी वे हकदार हैं। पहुँच, किफायत और उपलब्धता जैसी प्रमुख चिंताओं का सरकार ने पूरी तरह समाधान कर दिया है। अब सभी अभिभावकों को इस सुनहरे अवसर के बारे में जागरूक होने की आवश्यकता है, ताकि उनकी 14 साल की बेटियाँ नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर निशुल्क टीकाकरण का लाभ उठा सकें। हमारी बेटियों के लिए एक साधारण सा टीका, सर्वाइकल कैंसर के उन्मूलन और विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा।











