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आदर्श हिमाचल ब्यूरों
कुल्लू । आधुनिक दौर में जहां युवा नई तकनीकों और नौकरियों की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं पारंपरिक खड्डी (हैंडलूम) जैसी कलाएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। कभी गांव-गांव में गूंजने वाली खड्डी की आवाज अब सुनाई देना दुर्लभ हो गया है।
लेकिन रामलाल (गांव डराटी, पालमपुर, जिला कांगड़ा) पिछले 30–35 वर्षों से इस पारंपरिक कला को जीवित रखने में जुटे हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने हुनर और मेहनत के बल पर शॉल बुनाई की इस विरासत को न सिर्फ सीखा बल्कि आज भी पूरे समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने इस कला की शुरुआत देवभूमि स्पिनिंग मेला से की और बाद में अनुभवी कारीगरों के साथ काम करते हुए महारत हासिल की। चंबा में उन्होंने दो साल तक युवाओं और महिलाओं को प्रशिक्षण देकर इस कला को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाई।
रामलाल पारंपरिक कुल्लू और किन्नौरी डिजाइनों में शॉल बनाने में माहिर हैं। एक शॉल तैयार करने में कई दिन लगते हैं, जिसमें ऊन की सफाई, धागा बनाना, रंगाई और बुनाई जैसे कई जटिल चरण शामिल होते हैं। उनके हाथों से बनी शॉल बाजार में 14–15 हजार रुपये तक बिकती है, जो उनकी मेहनत और कला की असली पहचान है।
अब उनका सपना है कि 2–4 मशीनों के साथ एक छोटा प्रशिक्षण केंद्र शुरू कर युवाओं को यह कला सिखाएं, ताकि उन्हें रोजगार भी मिले और यह परंपरा भी जीवित रहे।
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