सरदार पटेल ने राजनीतिक सीमाओं का ही नहीं, आधुनिक भारत की संस्थागत चेतना का भी किया एकीकरण: न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा

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आदर्श हिमाचल ब्यूरों 

शिमला। दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल के राष्ट्र-निर्माण संबंधी योगदान को केवल 560 से अधिक देशी रियासतों के भारत में विलय तक सीमित करके देखना उनके विराट व्यक्तित्व और दूरदर्शी राष्ट्र-दृष्टि का अधूरा मूल्यांकन होगा। सरदार पटेल ने भारत के राजनीतिक भूगोल को एकीकृत करने के साथ-साथ ऐसी सुदृढ़ संस्थागत और प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो स्वतंत्र भारत की एकता, स्थिरता और संवैधानिक शासन को दीर्घकालिक आधार प्रदान कर सके।

 

 

न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा आज भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), राष्ट्रपति निवास, शिमला में ‘सरदार पटेल की दृष्टि: एकीकरण, एकात्मता और संघवाद’ विषय पर आयोजित त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र में समापन व्याख्यान दे रही थीं। संस्थान के पुस्तकालय सभागार में आयोजित इस सत्र में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की अध्यक्षा प्रोफेसर शशि प्रभा कुमार ने अध्यक्षीय संबोधन दिया।

 

अपने समापन व्याख्यान में न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा ने सरदार पटेल की राजनीतिक, प्रशासनिक और संवैधानिक दृष्टि को आधुनिक भारत की संस्थागत यात्रा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष केवल सत्ता हस्तांतरण की चुनौती नहीं थी। एक ओर सैकड़ों देशी रियासतों के भविष्य का प्रश्न था, तो दूसरी ओर विविध भाषाओं, संस्कृतियों, सामाजिक संरचनाओं और क्षेत्रीय आकांक्षाओं से युक्त विशाल भूभाग को एक स्थिर राष्ट्र और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में संगठित करने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी थी। ऐसे निर्णायक समय में सरदार पटेल ने अद्भुत राजनीतिक दृढ़ता, व्यावहारिक बुद्धिमत्ता और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का परिचय दिया।

 

 

उन्होंने रेखांकित किया कि सरदार पटेल के लिए राष्ट्रीय एकीकरण केवल मानचित्र पर सीमाओं को जोड़ने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि लोगों, संस्थाओं और प्रशासन को एक साझा राष्ट्रीय उद्देश्य से जोड़ने का प्रयास था। उनके नेतृत्व में देशी रियासतों का एकीकरण भारत के इतिहास की असाधारण उपलब्धि बना, किंतु उनकी दूरदर्शिता इससे कहीं आगे थी। अखिल भारतीय सेवाओं की आवश्यकता और प्रशासनिक निरंतरता पर उनका बल इस समझ को दर्शाता है कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की शक्ति केवल राजनीतिक नेतृत्व में नहीं, बल्कि निष्पक्ष, सक्षम और उत्तरदायी संस्थाओं में भी निहित होती है।

 

न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि सरदार पटेल की संस्थागत दृष्टि का अध्ययन समकालीन भारत के संदर्भ में विशेष महत्त्व रखता है। संविधान किसी राष्ट्र को आदर्श और दिशा प्रदान करता है, किंतु इन आदर्शों को नागरिकों के जीवन में वास्तविकता में बदलने का दायित्व संस्थाओं पर होता है। न्याय, समानता और संवैधानिक शासन की अवधारणाएं तभी प्रभावी होती हैं, जब संस्थाएं सुदृढ़ हों, उनमें कार्यरत व्यक्तियों को अपने संवैधानिक दायित्वों का बोध हो और प्रशासन नागरिकों के प्रति उत्तरदायी रहे।

 

 

न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा ने न्याय की संवैधानिक दृष्टि और संस्थागत शिक्षा के बीच गहरे संबंध पर भी विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि न्याय केवल न्यायालय में दिए गए निर्णय का नाम नहीं है; यह संविधान द्वारा परिकल्पित उस व्यापक सामाजिक व्यवस्था का अंग है, जिसमें प्रत्येक नागरिक की गरिमा, अधिकार और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित हो। न्यायिक संस्थाओं को बदलती सामाजिक, तकनीकी और विधिक परिस्थितियों के प्रति निरंतर सजग रहना आवश्यक है। इसी कारण न्यायिक शिक्षा, सतत प्रशिक्षण और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के तुलनात्मक अध्ययन की भूमिका लगातार महत्त्वपूर्ण होती जा रही है।

 

 

सरदार पटेल के संदर्भ में उन्होंने कहा कि उनके प्रशासनिक चिंतन का एक महत्त्वपूर्ण संदेश संस्थागत निरंतरता और संस्थागत क्षमता में निहित है। स्वतंत्र भारत के निर्माण के प्रारंभिक वर्षों में पटेल ने यह समझा कि राष्ट्र की एकता को बनाए रखने के लिए केवल भावनात्मक आह्वान पर्याप्त नहीं होगा; इसके लिए ऐसी प्रशासनिक संस्थाओं की आवश्यकता होगी, जो देश के प्रत्येक भाग में संवैधानिक शासन और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ कर सकें। यही कारण है कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के विकास में उनकी भूमिका आज भी गहन अध्ययन का विषय है।

 

न्यायमूर्ति शर्मा ने इस बात पर बल दिया कि सरदार पटेल के जीवन से कर्तव्य, अनुशासन, निर्णय क्षमता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की भावना सीखी जा सकती है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु राष्ट्रीय हित और संवैधानिक मूल्यों के प्रश्न पर संस्थाओं तथा नागरिकों की साझा प्रतिबद्धता ही राष्ट्र को स्थायित्व प्रदान करती है। सरदार पटेल ने असाधारण विविधता के बीच संवाद, दृढ़ता और व्यावहारिक राज्य-कौशल के माध्यम से जिस राष्ट्रीय एकता को आकार दिया, उसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

 

 

माननीय न्यायमूर्ति डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा का न्यायिक और अकादमिक जीवन भी संस्थागत शिक्षा तथा संवैधानिक न्याय के अध्ययन से गहराई से जुड़ा रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में बी.ए. (ऑनर्स) करने के दौरान उन्हें दौलत राम कॉलेज की वर्ष की सर्वश्रेष्ठ सर्वांगीण छात्रा चुना गया। उन्होंने वर्ष 1991 में एलएल.बी. तथा वर्ष 2004 में एलएल.एम. की उपाधि प्राप्त की। मात्र 24 वर्ष की आयु में मजिस्ट्रेट के रूप में न्यायिक सेवा में प्रवेश करने वाली न्यायमूर्ति शर्मा 35 वर्ष की आयु में सत्र न्यायाधीश बनीं।

 

 

दिल्ली जिला न्यायालयों में विभिन्न दीवानी एवं आपराधिक न्यायालयों की अध्यक्षता करने के बाद नवंबर 2019 में उन्हें प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, उत्तरी जिला नियुक्त किया गया। मार्च 2022 में उन्होंने राउज एवेन्यू न्यायालय, दिल्ली में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष न्यायाधीश (सीबीआई) का दायित्व संभाला तथा 28 मार्च 2022 को दिल्ली उच्च न्यायालय की स्थायी न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत हुईं।

 

 

कॉमनवेल्थ ज्यूडिशियल एजुकेशन इंस्टीट्यूट, कनाडा की फेलो के रूप में न्यायमूर्ति शर्मा न्यायिक शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय रही हैं। उन्होंने सेंट्रल एंड ईस्टर्न यूरोपियन लॉ इनिशिएटिव (CEELI) के लिए रिसोर्स पर्सन के रूप में भी विश्व के विभिन्न देशों के न्यायाधीशों और विधि विशेषज्ञों के साथ न्यायिक प्रशिक्षण तथा सुधार पर विचार साझा किए हैं। चार वर्षों के व्यापक शोध के बाद वर्ष 2025 में उन्हें ‘Achieving Constitutional Vision of Justice Through Judicial Education: A Comparative Study of the Best Practices in the UK, USA, Singapore, and Canada’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्रदान की गई।

 

 

न्यायमूर्ति शर्मा ने सामाजिक चेतना और न्यायिक शिक्षा से जुड़े विषयों पर कई पुस्तकें भी लिखी हैं। उनकी कृतियों में ‘Don’t Break After Break-Up’, ‘Beyond Baghban’, ‘Tumhari Sakhi’, उपन्यास ‘Love Full Circle’ तथा ‘Judicial Education – Achieving Constitutional Vision of Justice’ शामिल हैं। महिलाओं के अधिकारों और वरिष्ठ नागरिकों की चुनौतियों से लेकर न्यायिक शिक्षा और संवैधानिक न्याय तक, उनका लेखन समाज और संस्थाओं के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करता है।

 

 

सरदार पटेल ने विविधता को राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित किया: प्रोफेसर शशि प्रभा कुमार

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान की अध्यक्षा प्रोफेसर शशि प्रभा कुमार ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन और कार्य भारत की सभ्यतागत निरंतरता तथा आधुनिक राष्ट्र-निर्माण के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत की विविधता सदियों से उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का आधार रही है, किंतु स्वतंत्रता के निर्णायक काल में इसी विविधता को एक सुसंगठित राजनीतिक और प्रशासनिक राष्ट्र-व्यवस्था में रूपांतरित करना एक अभूतपूर्व चुनौती थी। सरदार पटेल ने अपनी दूरदर्शिता और अद्वितीय संगठन क्षमता से इस चुनौती को राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित किया।

 

 

प्रोफेसर कुमार ने कहा कि सरदार पटेल की राष्ट्र-दृष्टि में ‘एकता’ का अर्थ एकरूपता नहीं था। भारत की भाषायी, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय विविधताओं को स्वीकार करते हुए एक साझा राष्ट्रीय चेतना का निर्माण उनकी राजनीतिक दृष्टि की विशेषता थी। उन्होंने कहा कि भारतीय संघवाद की शक्ति भी इसी तथ्य में निहित है कि विविध इकाइयां अपनी विशिष्टताओं के साथ एक व्यापक संवैधानिक और राष्ट्रीय ढांचे का हिस्सा हैं।

 

उन्होंने कहा कि सरदार पटेल का योगदान भारत के राजनीतिक एकीकरण के साथ-साथ संस्थागत राष्ट्र-निर्माण के क्षेत्र में भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनका विश्वास था कि राष्ट्र को स्थायित्व प्रदान करने के लिए सक्षम प्रशासन, अनुशासित संस्थाएं और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना आवश्यक है। उनके विचारों में राष्ट्रीय एकता और प्रशासनिक दक्षता अलग-अलग अवधारणाएं नहीं थीं, बल्कि एक सुदृढ़ राष्ट्र की परस्पर पूरक आवश्यकताएं थीं।

 

 

प्रोफेसर शशि प्रभा कुमार ने कहा कि इतिहास के महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्वों का अध्ययन केवल स्मरण या श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अकादमिक संस्थानों का दायित्व है कि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के विचारों, निर्णयों और उनके दीर्घकालिक प्रभावों का शोधपरक और बहुआयामी अध्ययन किया जाए। उन्होंने कहा कि भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य भी सरदार पटेल के व्यक्तित्व को स्थापित धारणाओं से आगे बढ़कर संघवाद, प्रशासन, राष्ट्रीय सुरक्षा, संवैधानिक व्यवस्था और सभ्यतागत चेतना के व्यापक संदर्भ में समझना था।

 

 

उन्होंने कहा कि तीन दिनों के दौरान प्रस्तुत शोध-पत्रों और अकादमिक चर्चाओं ने स्पष्ट किया है कि सरदार पटेल की प्रासंगिकता केवल स्वतंत्रता के तत्काल बाद की परिस्थितियों तक सीमित नहीं है। केन्द्र और राज्यों के संबंध, संस्थागत क्षमता, प्रशासनिक उत्तरदायित्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और विविधता के बीच एकता जैसे प्रश्न आज भी भारतीय लोकतंत्र के केन्द्र में हैं। ऐसे में सरदार पटेल के चिंतन का गंभीर पुनर्पाठ समकालीन भारत को समझने के लिए भी आवश्यक है।

 

 

संस्थान के निदेशक प्रोफेसर हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि तीन दिवसीय संगोष्ठी के माध्यम से सरदार पटेल के राष्ट्र-निर्माण संबंधी योगदान को व्यापक अकादमिक संदर्भ में समझने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक एकीकरण के शिल्पकार के रूप में सरदार पटेल की भूमिका निर्विवाद है, किंतु भारतीय संघवाद, प्रशासनिक संस्थाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के संदर्भ में उनके विचारों पर भी निरंतर गंभीर शोध की आवश्यकता है।

 

 

संगोष्ठी के सह-संयोजक एवं भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के अध्येता डॉ. गुरप्रीत सिंह ने तीन दिवसीय अकादमिक विमर्श की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि संगोष्ठी में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वानों ने सरदार पटेल की राष्ट्रीय एकीकरण संबंधी दृष्टि, देशी रियासतों के विलय, हैदराबाद, कश्मीर, ओडिशा और पंजाब की पहाड़ी रियासतों, भारतीय सिविल सेवा, गांधीवादी राज्य-शिल्प, केन्द्र-राज्य संबंधों, राजकोषीय संघवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा, सोमनाथ तथा समकालीन संवैधानिक विमर्श सहित अनेक विषयों पर शोधपरक विचार प्रस्तुत किए।

 

 

तीन दिनों तक चली अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में इतिहास, राजनीति विज्ञान, विधि, लोक प्रशासन, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक अध्ययन से जुड़े देश-विदेश के विद्वानों एवं शोधकर्ताओं ने प्रत्यक्ष तथा ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की। अकादमिक विमर्श में यह प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया कि सरदार पटेल का भारत के एकीकरण में योगदान केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय राज्य की राजनीतिक, प्रशासनिक और संस्थागत संरचना के निर्माण का आधारभूत अध्याय है।

 

समापन सत्र का संचालन भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के अकादमिक संसाधन अधिकारी डॉ. राजीव कुमार मिश्रा ने किया। संस्थान के सचिव  मेहर चंद नेगी ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।