आदर्श हिमाचल ब्यूरो
बिलासपुर । आंखों के इलाज को लेकर सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भ्रम और कथित लापरवाही के आरोपों पर AIIMS Bilaspur ने कड़ा खंडन किया है। संस्थान ने स्पष्ट किया है कि मरीज को हुई धुंधली दृष्टि किसी भी प्रकार की चिकित्सीय लापरवाही नहीं, बल्कि दवा का सामान्य और अस्थायी प्रभाव था।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, 60 वर्षीय मरीज सुनीता ठाकुर, जो लंबे समय से मधुमेह से पीड़ित हैं, आंखों की रोशनी कम होने की शिकायत के साथ नेत्र रोग विभाग पहुंची थीं। जांच के दौरान उन्हें डायबिटिक रेटिनोपैथी तथा बाईं आंख में एडिमा की समस्या पाई गई। निर्धारित चिकित्सा प्रोटोकॉल के तहत 23 अप्रैल को उनकी बाईं आंख में एंटी-VEGF इंजेक्शन लगाया गया, जो सफल रहा और इसमें कोई जटिलता सामने नहीं आई।
बाद में मरीज द्वारा दाहिनी आंख में परेशानी की शिकायत की गई। जांच में पाया गया कि आंख को रगड़ने के कारण कॉर्नियल एब्रेशन हुआ था। इसके उपचार हेतु डॉक्टरों ने एंटीबायोटिक दवाओं के साथ एट्रोपिन आई ड्रॉप्स दीं और आंख पर पट्टी लगाई।
संस्थान ने स्पष्ट किया कि एट्रोपिन ड्रॉप्स के कारण पुतली फैल जाती है, जिससे अस्थायी रूप से धुंधला दिखाई देना और रोशनी के प्रति संवेदनशीलता होना सामान्य है।
मरीज को इस प्रभाव की जानकारी पहले ही दे दी गई थी। इसी अस्थायी स्थिति को गलत समझकर सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी प्रसारित की गई।
एम्स प्रशासन ने 25 अप्रैल को मरीज की पुनः जांच की, जिसमें दोनों आंखों की दृष्टि सामान्य पाई गई और इलाज के बाद किसी प्रकार की गिरावट दर्ज नहीं हुई।
संस्थान ने दोहराया कि उपचार पूरी तरह मानक नियमों के अनुरूप किया गया है और ‘गलत आंख में इलाज’ का आरोप पूरी तरह निराधार है।
अंत में AIIMS Bilaspur ने आम जनता से अपील की है कि वे अपुष्ट और भ्रामक खबरों पर विश्वास न करें तथा किसी भी जानकारी की पुष्टि आधिकारिक स्रोतों से ही करें। मरीजों की सुरक्षा, पारदर्शिता और गुणवत्तापूर्ण उपचार संस्थान की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
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