युवाओं के उज्ज्वल भविष्य हेतु स्वामी निवासाचार्य ने दिए सफलता के मंत्र

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आदर्श हिमाचल ब्यूरों

शिमला ।  मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञानयज्ञ के दूसरे दिन शनिवार को भागवत सत्र के दौरान आध्यात्मिक चेतना की ऐसी लहर चली कि पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु और श्रोता भाव-विभोर हो उठे। सुप्रसिद्ध कथावाचक Swami Nivasacharya Ji ने भक्ति, कर्म, आध्यात्म, मन की शांति, शिक्षा, संस्कार, युवा शक्ति और राष्ट्र निर्माण के गहरे संबंधों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि शांत मन, उत्तम शिक्षा और प्रभु कृपा से समाज की दिशा और दशा बदली जा सकती है।

 

 

स्वामी निवासाचार्य ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि मन की शांति ही जीवन का सबसे बड़ा वैभव है। आज का मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहा है, लेकिन भीतर से अशांत और बेचैन है। उन्होंने कहा कि ‘माया’ मनुष्य को भ्रमित कर देती है, जिससे वह क्षणिक सुख को ही स्थायी सत्य मान बैठता है। जब माया का पर्दा हटता है, तब परमात्मा का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है, जो सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है।

 

 

जीवन प्रबंधन, निद्रा, चिंता और गृहस्थ धर्म पर प्रकाश डालते हुए स्वामी जी ने कहा कि अति निद्रा शरीर को और अति चिंता आत्मा को कमजोर कर देती है। संयमित और संतुलित जीवन ही उन्नति का आधार है। उन्होंने कहा कि एक गुणवान पत्नी केवल घर नहीं संभालती, बल्कि परिवार, धर्म और समाज की मजबूत आधारशिला होती है।

 

स्वामी निवासाचार्य ने प्रभु की कार्यशैली का उल्लेख करते हुए कहा कि ईश्वर स्वयं सामने आकर कार्य नहीं करते, बल्कि किसी न किसी व्यक्ति को माध्यम बनाकर अपना कार्य सिद्ध करते हैं। इसलिए मनुष्य को स्वयं को प्रभु का योग्य ‘निमित्त’ बनाने का प्रयास करना चाहिए।

 

शिक्षा और संस्कारों के महत्व पर विशेष जोर देते हुए स्वामी जी ने कहा कि शिक्षा केवल डिग्री या रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें नैतिकता, मानवता, अनुशासन और आध्यात्मिक मूल्यों का समावेश होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि वह शिक्षा अधूरी है जो केवल बुद्धि का विकास करे, लेकिन चरित्र निर्माण न कर सके। सच्ची शिक्षा वही है जो व्यक्ति को अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा दे।

 

युवाओं को संबोधित करते हुए स्वामी निवासाचार्य ने कहा कि सत्संग केवल बुजुर्गों के लिए नहीं, बल्कि युवाओं के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। जब युवा शक्ति के पास ईश्वरीय भक्ति, उत्तम शिक्षा, संस्कार, शक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान का संतुलन होगा, तभी वे भटकाव से बचकर समाज, परिवार और राष्ट्र की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान दे पाएंगे। उन्होंने कहा कि एक संस्कारित और आध्यात्मिक युवा ही समर्थ राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।

 

उन्होंने कहा कि युवाओं को कर्मयोगी बनने के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान से भी जुड़ना चाहिए, क्योंकि आध्यात्मिक चेतना से युक्त युवा समाज और राष्ट्र की तस्वीर बदल सकते हैं। स्वामी निवासाचार्य ने कहा कि भारत कभी विश्वगुरु इसलिए कहलाता था क्योंकि यहां की शिक्षा व्यवस्था में वेदों, पुराणों, उपनिषदों और ऋषि-मुनियों के ज्ञान के साथ आध्यात्मिकता और संस्कारों का समावेश था।

 

उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज विश्व में बढ़ती नफरत, लालसा, हिंसा, अपराध और मानसिक अशांति का मुख्य कारण यह है कि लोग आध्यात्मिक जीवन और नैतिक मूल्यों से दूर होकर केवल भौतिकवाद की ओर बढ़ रहे हैं।

 

कम्युनिकेशन स्किल्स का उदाहरण देते हुए स्वामी जी ने कहा कि सच्चा श्रोता वह नहीं जो केवल कानों से सुनता है, बल्कि वह है जो बातों को हृदय से धारण करता है। सत्संग के महत्व को बताते हुए उन्होंने कहा कि “सत्संग वह साबुन है, जो मन के विकारों को धोकर उसे निर्मल और पवित्र बना देता है।”